छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों की आत्मनिर्भरता में छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक की भूमिका
भारती सिंह कुमेटी1 , सुनील कुमार कुमेटी2
1अतिथि व्याख्याता, अर्थशास्त्र विभाग, शासकीय दूधाधारी बजरंग महिला स्नातकोत्तर (स्वशासी) महाविद्यालय,
कालीबाड़ी चौक, रायपुर (छ.ग.)
2सह-प्राध्यापक, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.)
*Corresponding Author E-mail: bharti9229@gmail.com
ABSTRACT:
भारत में सतत् आर्थिक विकास के लिए ग्रामीण आत्मनिर्भरता एक महत्वपूर्ण घटक है। छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने और ग्रामीण आजिविका को समर्थन देने में अहम भूमिका निभाते हैं। यह अध्ययन छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक (सीआरजीबी) पर विशेष ध्यान केन्द्रित करते हुए, ग्रामीण छत्तीसगढ़ में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने में सीआरजीबी की भूमिका का विश्लेषण करता है। यह शोध सीआरजीबी की वार्षिक प्रतिवेदनों और भारतीय रिज़र्व बैंक के बुलेटिनों से एकत्रित द्वितीयक आंकड़ों पर आधारित है। निष्कर्ष बताते हैं कि सीआरजीबी ने ऋण विस्तार, वित्तीय समावेशन और कृषि एवं लघु उद्यमों को वित्तीय सहयोग प्रदान कर ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हालांकि, उच्च गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां और सीमित वित्तीय साक्षरता जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि सीआरजीबी के संचालन को सुदृढ़ करने से ग्रामीण आत्मनिर्भरता को और अधिक बढ़ाया जा सकता है।
KEYWORDS: छत्तीसगढ़, सीआरजीबी, ग्रामीण विकास, आत्मनिर्भरता, वित्तीय समावेशन।
1. प्रस्तावना
अपनी समृद्ध विरासत के लिए भारत दुनिया भर में जाना जाता है। भारत की पारंपरिक एवं सांस्कृतिक विविधता आज भी गाँवों में संरक्षित और प्रचलित है। गाँधीजी के शब्दों में ‘भारत की आत्मा गाँवों में निवास करती है।’गाँधीवादी दृष्टिकोण आत्मनिर्भर समुदायों और मनुष्य तथा प्रकृति के बीच संतुलन पर केंद्रित है।1 एक आर्थिक इकाई के रूप में ‘आत्मनिर्भर गाँव’ के निर्माण में वित्त एक महत्वपूर्ण कारक है। ग्रामीण विकास हेतु कृषि, उद्योग, व्यापार, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण आदि को सशक्त करने की आवश्यकता है। और इसके लिए प्रत्यक्ष रूप से पर्याप्त पूंजी का होना नितांत आवश्यक है। उपरोक्तानुसार ग्रामीण क्षेत्रों में यह कार्य क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा किया जा रहा है। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम 1976 के अनुसार बैंक की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र में कृषि, व्यापार, वाणिज्य, उद्योग एवं अन्य उत्पादनपरक कार्यकलापों के विकास हेतु, विशेषकर लघु एवं सीमान्त कृषकों, कृषि मजदूरों, ग्रामीण दस्तकारों एवं लघु उद्यमियों को साख एवं अन्य सुविधाएं उपलब्ध करवाना तथा उनमें बचत की आदत को बढ़ावा देना है। कालांतर में भारतीय रिज़र्व बैंक नियमों के अंतर्गत बैंक द्वारा प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों के अतिरिक्त अन्य उच्च मूल्य के ऋणों में भी वित्त पोषण किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में पूंजी के अभाव को दूर कर ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा भी किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ में इन बैंकों को छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक (सीआरजीबी) के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक 617 शाखाओं एवं 3300 से अधिक बैंक मित्र/बैंक सखी के माध्यम से, आधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हुए, राज्य के अंतिम छोर तक वित्तीय सेवाएं पहुंचाने का कार्य कर रही हैं। विशेष रूप से सरकार की प्राथमिकता प्राप्त योजनाओं जैसे- एनआरएलएम और स्टार्टअप इंडिया को सफलतापूर्वक जमीनी स्तर तक पहुंचाने में बैंक की भूमिका प्रशंसनीय रही है।2 छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक राज्य की सर्वाधिक जनसंख्या को वित्तीय सेवाओं से जोड़ने वाला एकमात्र ग्रामीण बैंक है। क्षेत्र में बढ़ती ऋण आवश्यकता की पूर्ति तथा उन्नत बैंकिंग सुविधा के सतत् विकास के प्रति बैंक समर्पित है। बैंक अपने उद्देश्यों के प्रति दृढ़ संकल्पित होकर सुदूरवर्ती एवं पहुंच विहीन क्षेत्रों में भी राज्य के समग्र विकास हेतु बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार कर रहा है।3
01 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना के समय राज्य में पाँच क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक कार्यरत थे। जिनमें से तीन क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का 2006 में विलय कर छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक का गठन किया गया तत्पश्चात् छत्तीसगढ़ राज्य के तीनों क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक, सरगुजा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, तथा दुर्ग-राजनांदगांव ग्रामीण बैंक) का समामेलन करते हुए 02 सितम्बर 2013 को छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक (शाखा संख्या 555) का गठन किया गया तथा प्रधान कार्यालय राजधानी रायपुर में रखा गया। जिसके अंतर्गत वर्तमान में प्रदेश के समस्त 33 जिलों में 617 नियमित शाखाएँ कार्यरत् हैं। कुल शाखाओं में से 7% शहरी, 13% अर्धशहरी, एवं 80% ग्रामीण शाखाएं हैं।4 छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक की कुल अंशपूंजी की संरचना भारत सरकार, राज्य सरकार, एवं भारतीय स्टेट बैंक (प्रायोजक बैंक) द्वारा क्रमशः 50%, 15%, 35% के अनुपात में अंश प्रदान किया गया है।
2. साहित्य समीक्षा
प्रारंभिक अध्ययनों ने ग्रामीण ऋण प्रणालियों को सुदृढ़ करने में आरआरबी की मूलभूत भूमिका पर बल दिया गया है। नाबार्ड (1986) की एक रिपोर्ट में यह बताया गया कि आरआरबी की व्यावहार्यता काफी हद तक प्रभावी निधि प्रबंधन, लागत नियंत्रण और कुशल संसाधन जुटाने पर निर्भर करती है। इसमें यह भी बताया गया कि उच्च स्थापना लागत और कमजोर परिचालन संरचनाओं के कारण वित्तीय घाटा होता है, जिससे संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता होती है। इसीप्रकार, कृषि ऋण समीक्षा समिति (1989) ने आरआरबी की स्थिरता पर सवाल उठाया और प्रायोजक बैंकों के साथ उनके विलय की सिफारिश की, यह तर्क देते हुए कि प्रणालीगत अक्षमताएं उनके प्रदर्शन में बाधा डालती हैं।
इसके बाद के शोधों में उत्पादकता और प्रदर्शन विश्लेषण पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। रेड्डी (2006) ने कुल कारक उत्पादकता का अध्ययन किया और पाया कि आर्थिक रूप से विकसित और कम बैंकिंग घनत्व वाले क्षेत्रों में कार्यरत् वाणिज्यिक बैंकों (आरआरबी) ने उच्च वृद्धि प्रदर्शित की है। डांगवाल और कपूर (2010) ने वाणिज्यिक बैंकों का तुलनात्मक विश्लेषण किया और वित्तीय संकेतकों के आधार पर उनके प्रदर्शन को वर्गीकृत किया, जिससे आरआरबी के मूल्यांकन के लिए एक उपयुक्त ढांचा प्रस्तुत किया गया। पति (2010) ने इस बात पर और जोर दिया कि आरआरबी ग्रामीण वित्तपोषण के लिए महत्वपूर्ण संस्थान हैं, जो लक्षित ऋण वितरण के माध्यम से कृषि और आर्थिक विकास को सुगम बनाते हैं।
तदुपरांत के अध्ययनों में वित्तीय समावेशन और ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने में आरआरबी की विकासात्मक भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। पुंडीर (2011) ने उल्लेख किया कि आरआरबी ग्रामीण क्षेत्रों में संस्थागत ऋण उपलब्ध कराकर गरीबी उन्मूलन और कृषि उत्पादकता में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। शर्मा (2015) ने इस दृष्टिकोण को पुष्ट करते हुए कहा कि, आरआरबी औपचारिक बैंकिंग प्रणालियों और ग्रामीण आबादी के बीच एक सेतु का काम करते हैं, विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों को उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप वित्तीय सेवाएं प्रदान करके लाभान्वित करते हैं।
इसके अतिरिक्त कई अध्ययनों में आरआरबी द्वारा सामना की जाने वाली परिचालन संबंधी चुनौतियों की भी पहचान की गई है। कुमार (2019) ने उच्च गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए), अपर्याप्त पूंजी और सीमित वित्तीय स्थिरता जैसे मुद्दों की ओर इशारा किया, जो उनकी प्रभावशीलता को सीमित करते हैं। क्षेत्रीय संदर्भ में, कापरे और सोनी (2013) ने छत्तीसगढ़ में आरआरबी का तुलनात्मक अध्ययन किया और पाया कि यद्यपि बैंकों ने अपने शाखाओं और पहुंच का विस्तार किया है, फिर भी खराब वसूली प्रदर्शन, कम उत्पादकता और उच्च एनपीए जैसी समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं।
टैगारिया (2016) ने भारत में ग्रामीण बचत बैंकों (आरआरबी) की भूमिका का एक वैचारिक विश्लेषण प्रस्तुत किया, जिसमें उनके उद्देश्यों, संरचना और प्रदर्शन पर जोर दिया गया। अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि आरआरबी ने ग्रामीण बचत जुटाने, रोजगार सृजन करने और साहूकारों जैसे अनौपचारिक ऋण स्रोतों पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। किन्तु, सीमित परिचालन क्षेत्र, कम लाभप्रदता और प्रायोजक बैंकों पर निर्भरता जैसे मुद्दे उनकी कार्यकुशलता और स्थिरता को प्रभावित करते रहते हैं।
बारोट और जापी (2021) ने भारतीय ग्रामीण बैंकिंग में आरआरबी की भूमिका और प्रदर्शन का अध्ययन किया। उनके अध्ययन में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि कमज़ोर वर्गों को ऋण उपलब्ध कराने और ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने में आरआरबी की भूमिका महत्वपूर्ण है। साथ ही, लेखकों ने वित्तीय व्यावहार्यता, बुनियादी ढांचे की सीमाओं और प्रबंधन की अक्षमताओं से संबंधित चिंताओं को भी उजागर किया है। उनका सुझाव है कि आरआरबी की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए वित्तीय प्रबंधन में सुधार, प्रौद्योगिकी को अपनाना और नीतिगत समर्थन आवश्यक है।
गौतम और कनौजिया (2022) ने 29 भारतीय राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों के पैनल डेटा का उपयोग करते हुए ग्रामीण विकास और डिजिटल साक्षरता पर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) के प्रभाव का विश्लेषण किया है। उनके अध्ययन में पाया गया कि आरआरबी डिजिटल साक्षरता और वित्तीय समावेशन में सुधार लाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। बैंकिंग अवसंरचना और डिजिटल सेवाओं के विस्तार ने ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय संसाधनों तक पहुंच को बढ़ाया है, जिससे आर्थिक विकास को बढ़ावा मिला है। साथ ही अध्ययन ने आरआरबी के प्रदर्शन में क्षेत्रीय असमानताओं को भी उजागर करता है, जो बेहतर अवसंरचना और नीतिगत समर्थन की आवश्यकता को दर्शाता है।
3. अध्ययन का उद्देश्य
इस अध्ययन का उद्देश्य छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के योगदान का विश्लेषण करना है। इसके लिए प्रस्तुत अध्ययन के निम्नलिखित उद्देश्य हैं:
1. प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक की वृद्धि एवं प्रदर्शन का विश्लेषण करना।
2. ग्रामीण क्षेत्रों के विकास हेतु बैंक द्वारा उपलब्ध कराये गये वित्तीय सुविधाओं की प्रगति का अध्ययन करना।
3. प्राथमिकता और गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में ऋणों के वितरण की प्रवृत्ति का अध्ययन करना।
4. ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने हेतु बैंक द्वारा किये गये कार्यों का अध्ययन करना।
4. अध्ययन की परिकल्पनाएँ
शून्य परिकल्पना (H₀): छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक का छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों को आत्मनिर्भर बनाने में कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं है।
वैकल्पिक परिकल्पना (H1): छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक का छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान है।
5. अनुसंधान पद्धति
प्रस्तुत अध्ययन हेतु वर्णात्मक एवं विश्लेषणात्मक अनुसंधान पद्धति को अपनाया गया है।
5.1 अध्ययन सामाग्री
यह अध्ययन मुख्यतः द्वितीयक आंकड़ों पर आधारित है। द्वितीयक आंकडों का संकलन छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक की वार्षिक प्रतिवेदनों, भारतीय रिज़र्व बैंक की बुलेटिन्स, आर्थिक सर्वेक्षण छत्तीसगढ़ एवं अन्य प्रशासकीय प्रतिवेदनों से किया गया है।
5.2 अध्ययन अवधि
प्रस्तुत शोध पत्र की अध्ययन अवधि छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक के रूप में स्थापना 2012-13 से 2024-25 तक 13 वर्षों की अवधि का अध्ययन किया गया है।
5.3 उपकरण एवं तकनीकें
प्रस्तुत अध्ययन में निम्नांकित सांख्यिकीय विधियों का उपयोग किया गया है। सारणीबद्ध विश्लेषण, प्रतिशत विश्लेषण, संयुक्त एवं औसत वार्षिक वृद्धि दर विश्लेषण, प्रवृत्ति विश्लेषण, तुलनात्मक विश्लेषण।
5.4 अध्ययन क्षेत्र
प्रस्तुत अध्ययन छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक की कार्यविधि, प्रदर्शन एवं ग्रामीण विकास में उनकी भूमिका तक सीमित है।
5.5 अध्ययन की सीमाएँ
यह अध्ययन मुख्यतः द्वितीयक आंकड़ों पर आधारित है, जिनमें अंतर्निहित सीमाएँ हो सकती हैं। निष्कर्ष प्रकाशित प्रतिवेदनों की सटीकता पर निर्भर करता है। प्राथमिक आंकड़ों की कमी, लाभार्थियों के अनुभवों की गहन जानकारी प्राप्त न करना अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है।
6. आंकड़ों का विश्लेषण एवं व्याख्या
प्रस्तुत अध्ययन में वर्ष 2012-13 से 2024-25 की अवधि के लिए बैंकों की जमा, उधार, ऋण एवं अग्रिम तथा ऋण वितरण से संबंधित आंकडों का विस्तृत विश्लेषण और व्याख्या प्रस्तुत की गई है। वृद्धि की प्रवृत्ति, संरचनात्मक परिवर्तनों और वित्तीय प्रदर्शन को समझने के लिए औसत वार्षिक वृद्धि दर (एएजीआर), प्रवृत्ति प्रतिशत विधि और अनुपात विश्लेषण जैसे सांख्यिकीय उपकरणों का उपयोग किया गया है।
6.1 छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक शाखाओं का विस्तार
|
सारणी क्र. 1 छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक शाखाओं का विस्तार |
|||||
|
वित्तीय वर्ष |
ग्रामीण |
अर्द्ध-शहरी |
शहरी |
कुल शाखाएँ |
|
|
2012-13 |
438 |
76 |
41 |
555 |
|
|
2013-14 |
463 |
78 |
41 |
582 |
|
|
2014-15 |
464 |
78 |
43 |
585 |
|
|
2015-16 |
474 |
80 |
43 |
597 |
|
|
2016-17 |
479 |
80 |
43 |
602 |
|
|
2017-18 |
484 |
80 |
43 |
607 |
|
|
2018-19 |
490 |
80 |
43 |
613 |
|
|
2021-22 |
491 |
80 |
43 |
614 |
|
|
2024-25 |
494 |
80 |
43 |
617 |
|
स्रोतः वार्षिक प्रतिवेदन, सीआरजीबी, रायपुर (वित्तीय वर्ष 2013-14 से 2024-25 तक)
व्याख्या: सितम्बर 2013 में छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक के गठन के समय बैंक की 555 शाखाएँ कार्यरत् थी, जो वर्ष-दर-वर्ष बढ़ते हुए 2024-25 तक 617 हो गई हैं। वर्ष 2014-15 से अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों तथा 2015-16 से शहरी क्षेत्रों में नई बैंक शाखाओं का कोई विस्तार नहीं किया गया है। इसप्रकार अब बैंक शाखाओं का विस्तार पूरी तरह से ग्रामीण क्षेत्रों की ओर किया जा रहा है। सीआरजीबी का यह पहल निश्चित रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की वित्तीय पहुंच को बढ़ाने में एवं आने वाले समय में ग्रामीण विकास में सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। स्थापना के समय की 555 शाखाओं में से 438 शाखाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत् थी जिनकी संख्या अब बढ़कर 494 हो गई है। अध्ययन अवधि में ग्रामीण क्षेत्रों में कुल 56 शाखाओं का विस्तार किया गया है, इसके अतिरिक्त शहरी क्षेत्रों में केवल 2 एवं अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों केवल 4 शाखाएँ स्थापित की गई। अर्थात् अब बैंक शाखाओं का विस्तार पूरी तरह से ग्रामीण क्षेत्रों में किया जा रहा है। इसप्रकार कुल शाखाओं में से 7%, शहरी, 13%, अर्धशहरी तथा 80% शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित हैं।
6.2 सीआरजीबी द्वारा वर्षवार ऋण एवं अग्रिम बकाया
सारणी क्र. 2. सीआरजीबी द्वारा वर्षवार ऋण एवं अग्रिम बकाया (राशि लाख रू. में)
|
वित्तीय वर्ष |
कुल जमा |
वृद्धि दर |
उधार शेष |
वृद्धि दर |
ऋण एवं अग्रिम बकाया |
वृद्धि दर |
साख-जमा अनुपात |
|
2012-13 |
6,04,81,146 |
17.1 |
29,93,749 |
19.07 |
1,99,21,541 |
17.72 |
32.94 |
|
2013-14 |
6,58,77,615 |
8.92 |
28,96,782 |
-3.24 |
2,08,80,317 |
4.81 |
31.7 |
|
2014-15 |
7,34,11,124 |
11.44 |
34,76,293 |
20.01 |
2,27,15,822 |
8.79 |
30.94 |
|
2015-16 |
8,16,09,743 |
11.17 |
26,36,577 |
-24.16 |
2,54,65,114 |
12.1 |
31.2 |
|
2016-17 |
9,12,21,823 |
11.78 |
42,63,540 |
61.71 |
2,64,32,525 |
3.8 |
28.98 |
|
2017-18 |
9,71,12,311 |
6.46 |
32,67,026 |
-23.37 |
2,83,49,833 |
7.25 |
29.19 |
|
2018-19 |
10,51,78,430 |
8.31 |
62,76,728 |
92.12 |
3,04,68,462 |
7.47 |
28.97 |
|
2019-20 |
11,33,17,720 |
7.74 |
15,06,271 |
-36.8 |
3,51,09,483 |
15.23 |
30.98 |
|
2020-21 |
12,47,22,523 |
10.06 |
30,04,752 |
99.48 |
4,45,77,381 |
26.8 |
35.69 |
|
2021-22 |
13,61,27,930 |
9.14 |
72,64,516 |
141.77 |
5,21,11,128 |
17.06 |
38.28 |
|
2022-23 |
14,33,51,160 |
5.31 |
1,21,67,148 |
67.49 |
6,41,62,769 |
23.13 |
44.76 |
|
2023-24 |
16,24,77,386 |
13.34 |
1,06,87,455 |
-12.16 |
8,03,36,770 |
25.21 |
49.76 |
|
2024-25 |
17,85,66,674 |
9.9 |
1,21,46,516 |
13.65 |
9,99,43,964 |
24.41 |
55.97 |
|
AAGR (%) |
9.5 |
20.5 |
15.8 |
-- |
|||
|
Trend |
295 |
406 |
502 |
-- |
|||
|
Trend (%) |
195 |
306 |
402 |
-- |
|||
स्रोतः वार्षिक प्रतिवेदन, सीआरजीबी, रायपुर (वित्तीय वर्ष 2013-14 से 2024-25 तक) एवं औसत वार्षिक वृद्धि दर एवं प्रवृत्ति विश्लेषण की गणना अनुसंधानकर्ता द्वारा किया गया है।
6.2.1 औसत वार्षिक वृद्धि दर: सीआरजीबी द्वारा वर्षवार ऋण एवं अग्रिम बकाया के अध्ययन से ज्ञात होता है कि ऋण एवं अग्रिम की औसत वार्षिक वृद्धि दर 15.8% जमा की औसत वार्षिक वृद्धि दर 9.5% की तुलना में अधिक दर से बढ़ी है, जो बैंक के ऋण विस्तार नीति की प्रमुखता को दर्शाती है। उधारी में उच्चतम वार्षिक वृद्धि दर 20.5% देखी गई है, लेकिन इसमें उच्च अस्थिरता भी है। जिससे संकेत मिलता है कि बैंक द्वारा उधारी का उपयोग एक स्थिर स्रोत के बजाय पूरक वित्तपोषण स्रोत के रूप में किया जा रहा है। जो कालांतर में बैंक के विकास के लिए नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
6.2.2 प्रवृत्ति विश्लेषण: बैंक की वर्षवार ऋण एवं अग्रिम बकाया की प्रवृत्ति विश्लेषण से पता चलता है कि ऋण एवं अग्रिमों में 5 गुना वृद्धि हुई है, जबकि जमा राशि में लगभग तीन गुना वृद्धि हुई है। उधार में 4 गुना से अधिक की वृद्धि हुई है, जो बाहरी वित्तपोषण स्रोतों पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाती है। यह ऋण अधारित विकास मॉडल की ओर बदलाव को इंगित करता है।
6.2.3 ऋण-जमा अनुपात: ऋण-जमा अनुपात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो 2012-13 में 32.94% से बढ़कर 2024-25 में 55.97% हो गया है। यह दर्शाता है कि ऋण देने के लिए जमा राशि का बेहतर उपयोग हो रहा है। हालांकि, लगातार बढ़ता अनुपात तरलता के दबाव को जन्म दे सकता है, खासकर यदि जमा वृद्धि ऋण विस्तार के अनुरूप न हो।
6.2.4 निष्कर्ष: समग्र प्रवृत्ति विश्लेषण से निम्नांकित निष्कर्ष प्राप्त हुए हैं -
§ सीआरजीबी ने रूढ़िवादी ऋण देने के दृष्टिकोण से हटकर आक्रामक ऋण विस्तार मॉडल को अपनाया है।
§ जमा राशि में स्थिर और निरंतर वृद्धि देखी गई है, जो जमाकर्ताओं के मजबूत विश्वास को दर्शाती है।
§ उधार अत्यधिक अस्थिर हैं, जो विस्तार चरणों के दौरान बाहरी निधियों पर निर्भरता को इंगित करते हैं।
§ 2020 के बाद की अवधि में उच्च ऋण वृद्धि की ओर एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव दिखाई देता है।
6.3 सीआरजीबी द्वारा क्षेत्रवार कुल ऋण वितरण
सारणी क्र. 3. सीआरजीबी द्वारा क्षेत्रवार कुल ऋण वितरण (राशि लाख रू. में)
|
वित्तीय वर्ष |
कुल ऋण |
प्राथमिकता क्षेत्र |
एसटी/एसी |
कृषक (लघु/ मध्यम/ कृषि मजदूर) |
अल्पसंख्यक |
|
2012–13 |
1,03,38,452 |
80,86,008 |
31,98,441 |
46,07,512 |
1,46,275 |
|
2013–14 |
95,30,038 |
78,70,433 |
29,48,387 |
43,97,228 |
1,49,069 |
|
2014–15 |
98,05,469 |
76,23,841 |
30,33,599 |
45,24,314 |
1,79,892 |
|
2015–16 |
1,19,09,815 |
85,02,953 |
36,89,661 |
54,58,762 |
4,83,007 |
|
2016–17 |
87,60,529 |
74,75,181 |
33,23,737 |
38,14,994 |
4,35,443 |
|
2017–18 |
1,03,73,616 |
79,87,684 |
39,35,750 |
33,54,827 |
4,79,261 |
|
2018–19 |
1,47,23,622 |
1,09,54,375 |
55,87,615 |
18,06,755 |
5,88,945 |
|
2019–20 |
2,39,16,502 |
1,81,76,542 |
93,27,436 |
51,04,636 |
9,56,660 |
|
2020–21 |
2,79,92,423 |
1,82,76,253 |
1,09,31,041 |
56,02,198 |
11,28,095 |
|
2021–22 |
3,20,73,071 |
2,11,71,822 |
88,12,483 |
59,44,778 |
14,44,859 |
|
2022–23 |
5,57,04,414 |
4,24,17,846 |
90,44,525 |
86,17,031 |
15,45,650 |
|
2023–24 |
6,00,27,519 |
4,19,20,996 |
1,08,47,641 |
1,11,94,833 |
22,47,364 |
|
2024–25 |
8,42,28,322 |
5,82,30,582 |
1,13,96,716 |
1,08,63,808 |
25,64,248 |
|
AAGR (%) |
22.6 |
21.3 |
14.2 |
12.8 |
30.5 |
|
Trend |
815 |
720 |
356 |
236 |
1753 |
|
Trend (%) |
715 |
620 |
256 |
136 |
1653 |
स्रोतः वार्षिक प्रतिवेदन, सीआरजीबी, रायपुर (वित्तीय वर्ष 2013-14 से 2024-25 तक) औसत वार्षिक वृद्धि दर एवं प्रवृत्ति विश्लेषण की गणना अनुसंधानकर्ता द्वारा किया गया है।
सारणी क्र. 3 के अनुसार क्षेत्रवार ऋण वितरण की प्रवृत्ति यह दर्शाता है कि प्रत्येक श्रेणी में वर्ष-दर-वर्ष ऋण वितरण में वृद्धि दर्ज की जा रही है। और यह वृद्धि कोविड-19 महामारी के बाद और तीव्र हुई है। कुल ऋणों में हिस्सेदारी के अध्ययन से ज्ञात होता है कि प्राथमिकता क्षेत्र में 75-80%, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की हिस्सेदारी मध्यम स्तर, लघु/मध्यम कृषक एवं कृषि श्रमिकों की हिस्सेदारी में अत्यधिक उच्चावचन एवं अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी में तीव्र वृद्धि है। प्राथमिकता क्षेत्र के ऋणों का प्रभुत्व नियामक मानदंडों के पालन को दर्शाता है। लेकिन उप-श्रेणियों के बीच असमानताएं इंगित करती हैं कि ऋण विस्तार का लाभ समान रूप से वितरित नहीं हैं।
6.3.1 औसत वार्षिक वृद्धि दर विश्लेषण: औसत वार्षिक वृद्धि दर की सहायता से विश्लेषण के अध्ययन से ज्ञात होता है कि कुल ऋण और प्राथमिकता क्षेत्र ऋण में तेजी से वृद्धि हुई है। अल्पसंख्यकों को प्रदान करने वाले ऋण में सबसे अधिक वृद्धि 30.5% दर्ज की गई है, जो वित्तीय समावेशन में मजबूत प्रगति का संकेत देती है। हालांकि, कृषि श्रेणियों में अपेक्षाकृत कम वृद्धि असमान ऋण वितरण को दर्शाती है।
6.3.2 प्रवृत्ति विश्लेषण: प्रवृत्ति विश्लेषण के अध्ययन से ज्ञात होता है कि -
§ कुल ऋणों में 8 गुना से अधिक वृद्धि हुई है, जो मजबूत ऋण विस्तार का संकेत है।
§ अल्पसंख्यक ऋणों में 17 गुना से अधिक वृद्धि दर्ज हुई है, जो अल्पसंख्यकों तक वित्तीय पहंच में उल्लेखनीय सुधार दर्शाती है। लेकिन, उनका आकार अपेक्षाकृत बहुत छोटा है।
§ कुल कृषि श्रेणियों में तुलनात्मक रूप से धीमी वृद्धि देखी गई है, जो समावेशी विकास में एक कमी को उजागर करती है।
6.3.3 निष्कर्ष: समग्र प्रवृत्ति विश्लेषण से ज्ञात होता है कि -
§ कुल ऋणों में मजबूत वृद्धि ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण पहुंच मे वृद्धि दर्शाती है।
§ अल्पसंख्यक ऋण वित्तीय समावेशन प्रयासों में महत्वपूर्ण सुधार दिखाते हैं।
§ अनुसूचित जाति/अनुसचित जनजाति और कृषि क्षेत्रों पर नीतिगत रूप से अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। तथ समग्र वृद्धि के बावजूद ऋणों का वितरण असमान है। जो वित्तीय समावेशन में गुणात्मक कमियों को दर्शाता है।
7. सुझाव
उपरोक्त विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि अध्ययन अवधि के दौरान ग्रामीण ऋण विस्तार में बैंक ने महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की है। एएजीआर, प्रवृत्ति प्रतिशत और अनुपात विश्लेषण के प्रयोग से इसकी ताकत और कमजोरी दोनों का पता चलता है। ऋण और अग्रिमों में वृद्धि से लाभप्रदता और वित्तीय पहुंच में वृद्धि हुई है, लेकिन उधार पर बढ़ती निर्भरता और असमान ऋण वितरण बैंक की स्थिरता के लिए चुनौतियां पेश कर रही हैं। संतुलित विकास के लिए बैंक को निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है -
§ बैंक जमाओं में वृद्धि को बढ़ावा देना जिससे ऋण वितरण हेतु अन्य स्रोतों अर्थात् बाहरी उधार पर निर्भरता कम किया जा सके।
§ ऋणों का समान वितरण सुनिश्चित करना, विशेषतः कृषि क्षेत्र में जिससे समावेशी विकास को और अधिक बढ़ावा दिया जा सके। क्योंकि कृषि और कृषि आधारित उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
§ दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता और समावेशी ग्रामीण आर्थिक विकास प्राप्त करने के लिए एक संतुलित और समावेशी दृष्टिकोण एवं नीति निर्माण की आवश्यकता है।
8. निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह न केवल बैंकिंग सेवाएं प्रदान करती है बल्कि रोजगार, कृषि विकास और गरीबी उन्मूलन में भी योगदान देती है। बैंक की वर्तमान कमियों को दूर कर इसे और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आत्मनिर्भर बनाया जा सके।
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वार्षिक प्रतिवेदन
1. वार्षिक प्रतिवेदन, छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक, रायपुर (वित्तीय वर्ष 2013-14 से 2024-25 तक)
2. भारतीय रिज़र्व बैंक के बुलेटिन्स (2014 से 2025 तक)
3. आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25, आर्थिक एवं सांख्यिकीय संचालनालय, छत्तीसगढ़, इन्द्रावती भवन, नवा रायपुर, अटल नगर, रायपुर (छ.ग.)
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Received on 09.02.2026 Revised on 18.02.2026 Accepted on 15.03.2026 Published on 20.03.2026 Available online from March 23, 2026 Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2026; 14(1):84-91. DOI: 10.52711/2454-2687.2026.00015 ©A and V Publications All right reserved
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